Politics
कब होय भिनसार बडी बिल खोदी
भारतमा सम्पर्क औ शिक्षित– दीक्षित कुछ बडे लोग तीस बरस कै पंचायत से असंतुष्ट औ बहुदलीय संसदीय व्यवस्था पर आकर्षित होइकै पंचायतका एक बन्द व्यवस्था बताय के जनताका अधिकार औ समृद्धि कै सपना देखाइन, औ आन्दोलन भवा । जनता इनकै साथ दिहिस औ २०४६ चैत्र २६ गते बहुदल केर घोषणा होइगा । जनता बडी प्रशन्न । व्यवस्था औ संविधान परिवर्तित भय । कांग्रेस से गिरिजा कोइराला दुइ तिहाई केर शक्तिशाली सरकार प्रमुख बने ।
हफता दिन के भित्तरै एमाले के ज्ञापनपत्र पर दोसर आन्दोलन शुरु होइगा । देश का सिंगापुर बनावैक बात भय । जनता बडी खुश । सत्ता उल्टाय दिहिस, मध्यावधि चुनाव भवा, लगडी पंगडी, मोलमोलाई,मेल मिलाई कै सरकार बनै लाग । भिनसार तौ हौइगा,नेतालोग मजेम होइगे । जनता मुह देखत रहिगै, लकिन बडी बिल नाय खोदी गय औ देश केर कलकारखाना, उद्योग सब बिकाय गे । युवक युवतीलोग मजुरी मेहनत करै खाडी तरफ भागै लागे ।
सत्ता अदलाबदली, नेता खरीदबिक्री सब चलतै रहा । २०५२ फागुन १ गते से माओवादी छापामार युद्ध शुरु होयगा । जनता का बतावा गवा कि असली क्रान्ति ई होय । अब जनता अधिकारसंपन्न होई औ देश सिंगापुर बनि जाई । इमा कुछ मधेशिउ भूमिगत भये, समूह बनाइन उनहू केर वाहवाही होय लाग । तब फिर जनता जागी औ माओवादका साथ दिहिस । प्रचण्ड, बाबुराम सब जीते । संविधान बदला , देश गणतन्त्र औ धर्मनिरपेक्ष बना । नेपाली जनता दलित, मधेशी, मुश्लिम, जनजाति, आर्य, खस, तमाम वर्गमा बाँटी गय, जिससे भाग भण्डा लगायके राज करैक सहज होइगा । अब तौ अस लाग कि सही मानेम सबेर भवा है । अब तौ बडी बिल खोदी जइबै करी । जनता मारे खुशी से भादौं के गोबर मेर फूलि गय । लकिन बिल नाय खोदी गय । देशमा रोजगार नाइ रहिगा तब मनई और जोर से विदेश भागै लाग, पलायन तेज होइगा । कोई कोई गाँव तौ अस खाली भए कि पूरे गाँव मा ओटरै नाय रहिगे , सब विदेश ।
यही बिच्चेम औरौ गणतन्त्रवादी मधेशी नेता जागे, तराईबासिनका गोलियाइन, आन्दोलन भवा तमाम मधेशी मरे । नागरिकता कानून बना । युपी बिहार से लोग भरभराय के नेपाल आइगे । स्थानीय मधेशी पहिले कै डरपोकनी आदत,औ दबाव से टुकुर टुकुर देखत रहिगे । लकिन जो नागरिकता लेहिन आवा रहै, उका किकै डेर, किकै दबाव < का साँच का झूँठ < ई तरफ अन्धाधुन्ध नागरिकता बाँटा गवा औ दोसरे ओर क्रिश्चिनियटी जंगल के आग मेर फइलै लाग । तब दखिन से आए लोगनमा जौन मुश्लिम तबका है ऊ ईसाइयत बिस्तार देखके चौंका, औ विदेशी ताकत, गोला बारुद, तमंचा, तलवार सब उनके खातिर सहज होइगा । वै लोग अपन सुरक्षातन्त्र बढावै औ बनावै लागे । कानून औ व्यवस्था केर कडा शासन प्रशासनवाला देश चुप्पी साधि लिहिस । हिन्दू अचम्भित होइकै चौराहे पर ठाढ देखत है ।
तब फिर भोर केर एक मुर्गा बोला । एक विपलवजी जागे । औ कुछ विशेष खूबीवाला काम करैक बतावैलागे । छापामार युद्ध फिर शुरु होइगा । नेपाली जनता कौतुकी तौ हइयै है, बस उनहू के साथ लाग गय । फिर तोडफोड औ विध्वंश । माओवादी केर हिंसा हत्या वापस आय गय । इनहू केर मनोकामना पूरी भय । पद प्रतिष्ठा पैसा या जस रीझे होंय रिझाए गए । ई औ इनकै आसेपासे, माने इनकै जनता केर काम बनि गवा ।
फिर तौ सरकारी वडा कार्यालय से लैकै स्कूल अध्यक्ष, मास्टर, कुलापानी चौधरी, गांव केर बडघर, कार्यपालिका, व्यवस्थापकिा, न्यायपालिका, उद्योग वाणिज्य, मानव अधिकारवादी, सामुदायिक वन, यातायात, पत्रकार औ हियाँं तक कि गाँव केर छोट छोट मन्दिर तक, कौनौ क्षेत्र नाय छूटा जिमा काँग्रेस, कम्युनिष्ट औ माओवादी कै पकड औ पदकै अंश बण्डा नहोय । इनहिन तीन के सिण्डीकेट से देश चलत है । व्यक्ति कै योग्यता माने पार्टी केर झोला, बस । इकै मतलब सत्ता चाहै जौन पार्टी सम्हारै, लकिन तीनौ मिलि बांट के खइहैं । नेतालोग चाहै नदी, पहाड, नागरिकता, भूटानी कहिकै नेपाली आदमी तक, कुछू बेंचैं, एमसीसी तक पास करैं, सबकाम तीन दल से होना है । यहै सिंडीकेट देश केर एकछत्र मालिक है । देश केर नियम कानून संविधान जौन रहैं, अब वहू केर काम नाइ रहिगा । जौ मधेशी या औरौ कोई भाईलोग ई सिण्डीकेट के आसपास “तनिक दादा हमहुक दइदे, तनिक दादा हमहुक दइदै” करत पहुंचि जात हैं तौ बटुली केर खुरचन – करौनी पाय जात हैं । दूध केर धोवा कोई नाइ रहा । इनकै जौ कोई विरोध करै तौ उका चुप करैक तरीका ई सिण्डीकेट जानत हैं ।
मदेशी नेतालोग समय समय पर कूदे फांदे बहुत, ई लोग औ इनकै जनता बहुत कुछ पइतौ रहत हैं लकिन साधारण जनता औ देश प्रदेश पहिलेव से जादा तरे गवा है । इनकै स्वार्थ औ गद्दारी तौ चरम बिन्दु पर तब देखान जब गणतन्त्र केर पहिल आवाज उठावैवाला एक बडा क्रान्तिकारी रामराजा प्रसाद सिंह का राष्ट्र्पति बनावै के बदला मा ई भाईलोग उल्टै विपक्षमा लागि गए ।
देशमा राष्ट्र्यिता औ एकता केर बडा नारा है । चाहै कोई नेतन के पाछे दसौ आदमी न होंय लकिन उके मनमा जौन विचार या सनक उठि जात है वही विचार का जनता केर विचार औ मत अभिमत कहि देत हैं । औ हर एक आदमी ई भ्रम मा परि जात है कि ई विचार हमार भले न होय लकिन जनता नामधारी कोई शक्ति केर विचार तौ होय । बस ऊ आदमी अपने विचार का महत्व नाय देत है, नेता का सही मानत है औ अपनेका अनबूझ मानि के नेता केर झोले बनि जात है । तबहिन तौ आजतक जतने आन्दोलन भए हैं, जनता आँख मूँदि के सबके पाछे लागि जात है । जनता कोई आन्दोलन केर विरोध करतै नाय है । करीब ३५ बरस से, जौन पुरानलोग जिन्दा हैं, औ जौन पैदा लिहिन हैं, उनतक सबका ई स्कूलिंग होत आवा कि काम न करौ, नेता पर भरोसा करो, पाछे लागौ, और का कुछ मिलै नमिलै तुमका जमीन, घर, नौकरी सब मिली ।
हाँ एक बडी गजब केर बात है कि हमरे लोकतन्त्रमा ओट चाहै जिका देव, ओट खराब ना होई, कोई उम्मेदवार ना हारी । काहे से सरकार औ विपक्ष चाहे जे बनै लकिन औरो जतने दल हैं,भागबण्डा सबका मिलबै करी । तब तौ जानौ सब कै सरकार है । चुनावमा कोई नाय हारा है, जनता जीती है, खाली देश हारा है बस ।
यही २०८२ भादौं २३ औ २४ गते । कुछ नवयुवक प्रकट भए औ काठमाण्डूकेन्द्रित आन्दोलन भवा, जिका जेनजी आन्दोलन कहा गा । सरकारी गोली चली ७६ लोग मारे गए, कथित जेनजी ओझल होइगे । लकिन जनसैलाब उमडि परा । संसद, सिंहदरबार, सर्वाेच्च अदालत आदि तमाम सरकारी– गैर सरकारी भवन औ पुरान रिकार्ड जलाये गए । पीएम ओली राजीनामा दइकै सुरक्षा घेरम लुकाय रहें । तमाम लुटपाट भय औ सरकार चलावैवाले कुछ अन्य लोग प्रकट भए । नये निर्वाचन केर घोषणा फाल्गुन २१ के खातिर भवा । वहै संविधान वहै व्यवस्था । उनहिन पुरातन राजनीतिक शक्ति केर गर्जन । ई विध्वंश को करावा, फायदा का भवा, नतीजा का होई, कुछ पता नाइ है । यहू आन्दोलन मा जनता खुब लाग । जनता के खातिर सबेर तौ होइगा, आशा केर किरण जगमगान, लकिन अबही तक बडी बिल खुदै केर आहट नाय मिली है । चुनाव के बाद देखौ बडी बिल खोदैक जिम्मा के के पावत है <
हमरे आन्दोलनन मइहन एक बात ई देखात है कि आन्दोलन से अपनेका कोई फायदा नमिलै तौ फिर कोई मौका देखौ, औ सोचौ कि भोर होय, कोई विदेशी मुर्गा बोलै, हम आन्दोलन करी, जनता हमरे आन्दोलनमा लागै औ हम देश का स्वीटजरलैण्ड या सिगापुर बनावै केर सपना बाँटी । हम जरुर जीती, तब देश भले ही स्वीटजरलैण्ड नबनै लकिन हमार होटल दुबईमा बनै औ बैंक खाता स्वीटजरलैण्डमा खुलै । अबही तक यहै होत आवा है । सब रंगे सियार हैं । देश के खातिर लडैवाला नेता औ आदमी कोई नाइ है । जौ कोई है तौ उकै सुनवाई नाइ है । जनता फिर सहारा देखत है कि फिर मुर्गा बोलै फिर सबेर होय औ अबकी कौनौ नवा नेता आन्दोलन करै औ सिंगापुर बनावैक बात करै तौ वहीका जितावा जाय । ऊ बडी बिल जरुर खोदी । ऊ हत्या, हिंसा, लूट, बलात्कार, भ्रष्टाचार, तस्करी चाहै जौन करै, जनता ओट दी जरुर, ई जनता, घृणा नाय जानत है, बडी क्षमाशील है ।
लेख कै शीर्षक “कब होय भिनसार बडी बिल खोदी” हिन्दी, अवधीमा एक प्रचलित मुहावरा है इकै अर्थ सबका पता होई तबहूँ लिखे दीत है । बिलार से मिलत जुलत एक लोखरी जाति केर जीव जादातर उँचवाई खेत औ छोटी झाडी मा रहत है । रात के ठंड मा शरीर छिपावै के खातिर कोई छोट गडहा देख के वहिमा दुबक के बैठि जात है । लकिन जब जाड बढत है औ पूरा शरीर बिल से नाय ढकि जात है तब खौखियात है कि “सबेर होय दे अबकी और बडा बिल खोदब”। लकिन जब सबेर होत है, घाम लाग, अपन देंह गरमान, रात भर अपने आत्मा से कीन वादा भुलाय जात है । औ रात के फिर वहै, कहानी । पूरा जीवन वादा करत करत बिना बिल के बीति जात है । वही लोखरिया मेर हमार नेता हर आन्दोलन, हर चुनाव, हर अवस्था हर बार जनताका सुख समृद्धि बाँटत हैं लकिन जब घाम लागत है तौ अपन देहीं सेकत हैं ।
-लेखक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी, प्राध्यापक, राजनीति औ दर्शनशास्त्र कै अध्येता अधिवक्ता होंय_